आम आदमी पर, सड़े-गले शिक्षा पद्धति से पढ़ी हुई आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा जीडीपी, आयात निर्यात, बैड-डेब्ट, एनपीए जैसे जटिल तथ्यों को समझता ही नहीं. उसे तो एक सुपर हीरो चाहिए जो उसे दिवा स्वप्न दिखाए, एकदम से किसी फ़िल्म के नायक की तरह – अकील अहमद
रंजन सोनी,अम्बिकापुर:– अकील अहमद होली क्रॉस गर्ल्स कॉलेज अम्बिकापुर में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर पदस्थ है, यह लेख उनके फेसबुक वालों से हूबहू ली गई है।

पिछली सरकारों ने जो काम शुरू किया था, 2014 के बाद उनके पूरे होने पर साहब फीता काटते वक़्त तो ऐसे हाथ लहराते हैं जैसे सब उन्होंने ही किया हो, और आज जब आर्थिक मोर्चे पर, महंगाई पर, चीन बॉर्डर पर लगभग हर क्षेत्र में नाकाम हो रहे हैं तो इन सबका ठीकरा पिछली सरकारों पर फोड़ देते हैं. वाह रे बेशर्मी और वाह रे मूर्ख भक्त…गुजरात मॉडल की अफवाह और काले धन वापसी का लालच देकर सत्ता में आये, आज पेट्रोल डीजल, दवा, राशन सब रिकॉर्ड तोड़ महंगा होता जा रहा है, फिर भी कहीं कोई चर्चा नहीं, कोई विरोध नहीं।
मुख्य विपक्षी पार्टी की बात करें तो इतनी नकारा है कि देश का विपक्ष छोड़िए ये अपने संगठन को संभाल लें यही बहुत बड़ी बात है. जिन राज्यों में इनकी सरकार थी या है वहां सरकारों के गठन के बाद भी इनका एक ना एक मंत्री, सरकार के ढंग से चलने कि चिंता के बजाय, खुद मुख्यमंत्री बनने की फिराक में रहता है और अपनी ही पार्टी से धोखा करता है. उसे देश या राज्य की नहीं बल्कि खुद के पद और अपने बेटे-भतीजों को स्थापित करने की चिंता ज्यादा रहती है. नतीजा, पार्टी का बेड़ा गर्क हो रहा है, फिर भी वाह रे पार्टी और वाह रे पार्टी के चमचे।
इन राजनैतिक दलों के कार्यकर्ताओं की बात करें तो पूरा जीवन पार्टी का झंडा उठाने में लगा देते हैं, बदले में इनके हाथ कुल इतना आता है कि कुछ बड़े ओहदेदार और प्रशासनिक अधिकारी इन्हें नाम से पुकार लेते हैं या उनके फोन बुक में इनका नाम दर्ज रहता है जिसका रौब ये अपनी पत्नियों या महबूबा को दिखाकर खुश हो लेते हैं. विपक्ष में रहते हुए बेचारे पुलिस की लाठियां खाते हैं, जेल जाते हैं, जब सत्ता में आते हैं तो उक्त सरकार इनकी अपनी सरकार है इस खुशफहमी में जीते रहते हैं, सुबह से शाम तक कौन मंत्री आया? कहां गया? क्या बोला ? भीतरखाने क्या चल रहा है आदि गप्पे मारकर अपने दोस्त-अहबाब को यह जताने की कोशिश करते रहते हैं कि वे सत्ता के कितने करीब हैं और सदैव किसी अज्ञात लाभ के प्रलोभन में अपना कीमती समय व्यर्थ गंवा देते हैं और धीरे से सत्ता का कार्यकाल निकल जाता है, इसके विपरीत सत्ता के लाभार्थी सदैव वही व्यापारी और दलाल रहते हैं जो पिछली सरकार में थे।
अब आते हैं आम आदमी पर, सड़े-गले शिक्षा पद्धति से पढ़ी हुई आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा जीडीपी, आयात-निर्यात, बैड-डेब्ट, एनपीए जैसे जटिल तथ्यों को समझता ही नहीं. उसे तो एक सुपर हीरो चाहिए जो उसे दिवा स्वप्न दिखाए, एकदम से किसी फ़िल्म के नायक की तरह कोई आकर सब कुछ बदल दे. उसे अपने अंदर पल रही स्त्री-पुरुष, धर्म-जाति, आर्थिक ऊंच-नीच के मतभेदों की तुष्टि का माध्यम चाहिए. जब उक्त माध्यम, एक सुनहरे कल का सपना लिए आता है तो वह उसका भक्त बन जाता है, लेकिन सपने और हक़ीक़त में फर्क होता है और हक़ीक़त यही है कि कमाई कम और खर्च उसके ज्यादा हैं, उसे खुद कमाना और परिवार का पेट भरना है. यह आम आदमी जब तक किसी मसीहा के आने का इंतजार करता रहेगा तब तक महंगाई उसकी जेब कतरती रहेगी, अव्यवस्था से रोज दो चार होते हुए वह अपमानित होता रहेगा, कुल मिलाकर जीवन संघर्ष में ही बीतना है. इसलिए कहता हूं सरकारें आती-जाती रहेंगी आप-हम वहीं रहेंगे कोई मोटा आसामी बनेगा तो केवल धंधेबाज और आपके वोटों का दलाल।
इसलिए खुद के मेहनत से गुजारा करने वालों से अपील, सरकारों की आलोचना करना सीखिए, कर नहीं सकते तो समर्थन दीजिये, समर्थन नहीं दे सकते तो तरफदारी मत करिए, भले ही आप वोट किसी को दें।



