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हाथियों का आतंक, एक रात में उजड़ा आशियाना, जंगल के सिकुड़ते रास्तों ने बढ़ाया संघर्ष…

उदयपुर से क्रांति कुमार रावत की रिपोर्ट…

मेंड्रा सतकोनापारा में 12 हाथियों के दल ने आलम नेटी के घर में मचाई तोड़फोड़, उदयपुर में पहले से 15 हाथियों की निगरानी में जुटा वन अमला…

सरगुजा/उदयपुर :- जंगल से निकलकर गांव की ओर बढ़ते हाथियों के कदमों ने एक बार फिर उदयपुर क्षेत्र के ग्रामीणों की नींद उड़ा दी है। प्रेमनगर थाना क्षेत्र के मेंड्रा सतकोनापारा में बीती रात कोरिया जिले की ओर से पहुंचे करीब 12 हाथियों के दल ने ग्रामीण आलम नेटी के घर में घुसकर जमकर तोड़फोड़ की, जिससे घर को भारी नुकसान पहुंचा है। अचानक हाथियों के गांव में पहुंचने से ग्रामीणों में दहशत फैल गई।

हाथियों का यह दल कोई पहली बार इस इलाके में नहीं पहुंचा है। आगे बढ़ते हुए यह दल आज उदयपुर वन परिक्षेत्र में आ जाएगा हमने देखा है हर साल सितंबर के आसपास हाथियों का यह दल इस क्षेत्र में पहुंचता है और नवंबर तक यहां के जंगलों और आसपास के इलाकों में विचरण करता है। इस दौरान खेतों में खड़ी फसलें रौंदी जाती हैं, मकानों को नुकसान पहुंचता है और कई बार इंसानी जान भी खतरे में पड़ जाती है। बीते वर्षों में हाथी के हमलों में कई लोगों की मौत की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।

एक तरफ 15 हाथियों की निगरानी, दूसरी तरफ नए दल की दस्तक…

उदयपुर वन परिक्षेत्र में इस समय करीब 15 हाथियों का एक दल पहले से सुखरी भंडार बिच्छल घाटी सायर ससाकालो लक्ष्मणगढ़ सहित आसपास के जंगलों में सक्रिय है। वन विभाग का अमला चौबीसों घंटे हाथियों की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है। इसी बीच करीब 12 हाथियों के दूसरे दल के पहुंचने की सूचना ने वन विभाग के साथ ग्रामीणों की चिंता और बढ़ा दी है।

वन अमले के सामने अब दोहरी चुनौती …

एक ओर हाथियों की सुरक्षित निगरानी और दूसरी ओर ग्रामीणों को हाथियों से बचाना। गांवों में लोगों को लगातार सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है।

सवाल सिर्फ हाथियों का नहीं, सिकुड़ते जंगल का भी है…

लेकिन इस पूरी घटना का दूसरा पहलू भी बेहद गंभीर है। सवाल यह नहीं है कि हाथी बार-बार गांवों की ओर क्यों आ रहे हैं, बल्कि सवाल यह भी है कि क्या उनके जंगल और पारंपरिक आवागमन के रास्ते लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं?

हाथी जंगल का जीव है। उसके आने-जाने के रास्ते आज के नहीं, बल्कि दशकों पुराने हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि लगातार खनन के लिए जंगल की जमीनों का अधिग्रहण और खदानों का विस्तार होने से हाथियों के प्राकृतिक आवागमन मार्ग प्रभावित हो रहे हैं। जंगल और रहवास क्षेत्र में बढ़ती मानवीय गतिविधियों के कारण हाथियों का पारंपरिक इलाका बाधित हो रहा है।

जब जंगल में रास्ते और भोजन के क्षेत्र कम होते हैं तो हाथी गांवों और खेतों की ओर रुख करते हैं। यही स्थिति धीरे-धीरे मानव-हाथी संघर्ष को जन्म देती है।

खदानों के विस्तार के बाद बढ़ीं घटनाएं!…

स्थानीय स्तर पर यह दावा किया जाता रहा है कि उदयपुर वन परिक्षेत्र में खनन गतिविधियों के विस्तार के बाद पिछले करीब 10 वर्षों में हाथी के हमलों में एक दर्जन से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। इसके अलावा फसलों और घरों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं।

ऐसे में हर साल हाथियों के आने के समय ग्रामीणों के सामने वही डर खड़ा हो जाता है—अगली रात किसके घर की बारी होगी?

यह स्थिति केवल ग्रामीणों के लिए खतरा नहीं है, बल्कि हाथियों के लिए भी संकट पैदा कर रही है। जंगल में रहने वाला वन्यजीव जब अपने प्राकृतिक क्षेत्र से निकलकर आबादी में पहुंचता है तो टकराव की स्थिति दोनों के लिए जानलेवा हो सकती है।

अब सिर्फ निगरानी नहीं, स्थायी समाधान की जरूरत…

हर साल हाथियों के आने पर वन विभाग द्वारा निगरानी बढ़ा दी जाती है, ग्रामीणों को सतर्क किया जाता है और हाथियों को आबादी से दूर रखने की कोशिश की जाती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल निगरानी से इस समस्या का स्थायी समाधान संभव है?

शासन-प्रशासन को अब इस पूरे मामले को व्यापक स्तर पर देखने की जरूरत है। हाथियों के पारंपरिक कॉरिडोर, जंगल और उनके प्राकृतिक रहवास क्षेत्रों को सुरक्षित रखने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। विकास और खनन गतिविधियों के बीच वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और ग्रामीणों की सुरक्षा का संतुलन कायम करना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

अन्यथा जंगल सिकुड़ते जाएंगे, हाथियों के रास्ते बाधित होते जाएंगे और गांवों की ओर उनके कदम बढ़ते जाएंगे। ऐसे में मानव और हाथी—दोनों की कीमत पर संघर्ष बढ़ता जाएगा।

ग्रामीणों से अपील…

हाथियों की मौजूदगी वाले क्षेत्रों में ग्रामीणों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है। हाथियों के करीब जाने, उन्हें घेरने, उनका पीछा करने या उन्हें उकसाने से बचना चाहिए। हाथियों की गतिविधि दिखाई देने पर तत्काल वन विभाग को सूचना देना ही सबसे सुरक्षित कदम है।

उदयपुर में हाथियों की दस्तक हर साल होती है, लेकिन इस बार सवाल बड़ा है—क्या हम केवल हाथियों को गांव से दूर रखने की कोशिश करेंगे, या उनके जंगल और सदियों पुराने रास्तों को भी बचाने की दिशा में गंभीर कदम उठाएंगे?

उदयपुर वन परिक्षेत्र में हाथियों से हुए नुकसान का जानकारी RTI से निकाला गया है जो कि सौ से अधिक पेज में है। दस्तावेज से पता चलता है कि कितना व्यापक नुकसान जान से हाथ धोकर आमजन और फसलों का नुकसान किसानों को उठाना पड़ता है।

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