मित्रता की मिसाल है कृष्ण सुदामा की मित्रता – अशोक कृष्ण जी महाराज…
अंबिकापुर :- बनारस रोड होटल बंधन में चल रहे सप्त दिवसीय भागवत कथा का समापन दिवस पर आज अशोक कृष्ण जी महाराज ने अपने ओजपूर्ण वाणी से श्रोताओं में समा बांध दिया। श्रोता कथा सुनने में इतने मस्त हुए की वे अपनी जगह से नहीं हिले।

आज कथा के अंतिम दिवस में कथावाचक अशोक जी महाराज ने भजनों से श्री कृष्ण की भजनों से अपनी कथा की शुरुआत की तत्पश्चात श्री कृष्ण की विवाह का वर्णन किया और श्रोताओं का मन मोह लिया उन्होंने बताया कि श्री कृष्ण का प्रथम विवाह कुंडलपुर की महारानी माता रुक्मणी से हुआ दूसरा विवाह जामवंत से 27 दिनों की युद्ध के उपरांत उनकी पुत्री जामवंती से हुआ और तीसरा विवाह शक्रजित की पुत्री सत्यभामा से …इतने में ही भगवान की विवाहों का सिलसिला नही टूटा बलिक 8 विवाह उन्होंने अपनी मर्जी से की लेकिन सभी विवाह परिस्थितिजन्य स्थितियों में हुआ ना कोई तिथि की सूचना और ना ही पहले से कोई तैयारी।

जबकि 16100 कन्याओं को दुष्ट नरकासुर ने अपने कब्जे में बंधक बना रखा था जिसे नरकासुर के कब्जे से मुक्त कराया गया और जब मुक्त होकर उन कन्याओं ने ए कहा कि अब हम कहां जाएंगे तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें भी अपनी रानी बना लिया और अपने चरणों में जगह दे दी । कुल मिलाकर भगवान का भगवान श्री कृष्ण का 16108 विवाह हुए।

कथा व्यास अशोक कृष्ण जी ने अपने कथा में अकबर बीरबल के प्रसंग भी सुनाया जिसमें बीरबल की पुत्री ने राजा अकबर को अपनी बुद्धिमता का परिचय देते हुए भगवान के बारे में बताया। तत्पश्चात राजा नग का प्रसंग, इसके बाद राजा पौंड्रक एवं उनके मित्र काशीराज का प्रसंग भी कथा में लोगों का मन मोह लिया। बीच-बीच में कथा व्यास ने अपनी मधुर वाणी से और मधुरमई संगीत से भजनों का भी रसास्वादन करा रहे थे जब इसी बीच एक मधुर “भजन कान्हा बरसाने में आ जइयो बुलाए राधा रानी” सभी लोगों को झुमा दिया।
तत्पश्चात श्री कृष्ण और सुदामा का मित्रता का वर्णन करने लगे और बताया कि आज तक इनकी मित्रता की मिसाल दिया जाता है क्योंकि प्रभु श्री कृष्ण महाराजा होते हुए भी एक दीन- हीन ब्राह्मण मित्र को अपने बराबर अपने सिंहासन पर बिठाकर अपने आंसुओं से पैर धोकर और लोगों के सामने एवं अपनी रानियों के सामने उनका सम्मान बढ़ाया और अपनी मित्रता का परिचय दिया। जब सुदामा जी अपने गृह ग्राम सुदामापुरी से द्वारका आ रहे थे तो उन्हें द्वारका बहुत दूर लग रही थी इसी बीच उन्होंने एक भजन भी गया था “कैसे आऊं रे कन्हाई बड़ी दूर नगरी” उस भजन का भी अशोक कृष्ण शास्त्री ने लोगों के सामने श्रोताओं को सुना कर एवं उनको झूमा कर उन्हें मंत्रमुग्ध कर दिया।
अंत में श्री कृष्ण एवं सुदामा की झांकी निकाली गई झांकी के साथ ही लोगों ने श्री कृष्ण सुदामा के झांकी का दर्शन किया, साथ ही सुदामा जी के चावल एवं तुलसी दल का वितरण भी किया गया।

और कथा के अंत में आरती के साथ सप्त दिवसीय कथा का समापन किया गया। हालाकी कथा व्यास ने व्यासपीठ से कहा था कि वह भागवत जी की अंतिम श्लोक का पाठ सभी श्रद्धालुओं से कराएंगे लेकिन किसी कारणवश वह नहीं करा पाए।
और अंत में भंडारे के साथ सप्त दिवसीय कथा का समापन हो गया।
विदित हो कि इस भागवत कथा को चौहान परिवार एवं होटल बंधन इन के संचालक सचिन सिंह उर्फ तन्नू ने कराया है और आसपास के क्षेत्र को भक्तिमय कर दिया है।


